Mahavir Prasad Dwivedi Class 10th Hindi क्षितिज भाग 2 CBSE Solution

Class 10th Hindi क्षितिज भाग 2 CBSE Solution
Exercise
  1. कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर…
  2. ‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’- कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने…
  3. द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा विरोधी कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है-…
  4. पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना क्या उनके अपढ़ होने का सबूत है- पाठ…
  5. परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ाते हों-…
  6. तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।…
  7. महावीरप्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, कैसे?…
  8. द्विवेदी जी की भाषा-शैली पर एक अनुच्छेद लिखिए।
  9. निम्नलिखित अनेकार्थी शब्दों को ऐसे वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए जिनमें उनके एकाधिक अर्थ…
  10. अपनी दादी, नानी और माँ से बातचीत कीजिए और (स्त्री-शिक्षा संबंधी) उस समय की स्थितियों का…
  11. लड़कियों की शिक्षा के प्रति परिवार और समाज में जागरूकता आए-इसके लिए आप क्या-क्या करेंगे?…
  12. स्त्री-शिक्षा पर एक पोस्टर तैयार कीजिए।
  13. स्त्री-शिक्षा पर एक नुक्कड़ नाटक तैयार कर उसे प्रस्तुत कीजिए।

Exercise
Question 1.

कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया?


Answer:

लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी का हिन्दी साहित्य के उत्तम गद्यकारों में स्थान माना जाता है। उनकी प्रस्तुत रचना में कुछ पुरातनपंथी लोगों द्वारा स्त्री शिक्षा के विरोधी रहने की बात पर लेखक द्वारा चिंता प्रकट की गई है। वास्तव में हम स्त्री शिक्षा के विरोध की प्रवृत्ति को काफी लंबे समय से हमारे समाज में चलती आई एक सामाजिक कुरीति मान सकते हैं। ऐसी प्रवृत्ति द्विवेदी युग में भी थी। हमारे समाज में ऐसी सोच का जन्म संभवतः उत्तर वैदिक काल के दौरान हुआ। इससे पूर्व ऋग्वैदिक काल में समाज में लोग स्त्री शिक्षा का समर्थन करते थे। जिसका उदाहरण हम उस समय की पढ़ी-लिखी महिलाओं जैसे गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी विदुषियों के माध्यम से देख सकते हैं|

द्विवेदी जी ने इस प्रकार कहते हुए स्त्री शिक्षा का समर्थन किया है कि जब पुराने समय में स्त्रियाँ अधिक नहीं तो कम से कम थोड़ा तो शिक्षित थीं ही। उनका इस प्रकार मानना है कि सभी स्त्रियाँ भले ही उपरोक्त महिलाओं की तरह विद्वान न रही हों और अधिकतर महिलाएं केवल प्राकृत भाषा ही जानती हों। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे सभी महिलाएं अनपढ थीं। पुरूषों में भी सभी संस्कृत भाषा जानने वाले नहीं थे। यही हाल महिलाओं का भी रहा होगा और हो न हो काफी संख्या में स्त्रियाँ अवश्य ही प्राकृत भाषा में दक्ष रही होंगी। इस प्रकार वे अनपढ़ तो थीं ही नहीं। द्विवेदी जी फिर महिलाओं की शिक्षा आज के समय की जरुरत मानते हैं।



Question 2.

‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’- कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने कैसे किया है, अपने शब्दों में लिखिए।


Answer:

‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’- कुतर्कवादियों के ऐसे कुतर्क को लेखक अपने व्यंग्यवाण से छलनी कर देते हैं। लेखक का मानना है कि अनर्थ करने के लिए मनुष्य का पुरूष या स्त्री होना कोई खास मायने नहीं रखता और इसका इनकी पढाई-लिखाई से भी कोई खास रिश्ता नहीं है। किसी कार्य की संपूर्णता हेतु उस कार्य में कुशलता की कामना की जाती है। यह कुशलता पुरूष में भी हो सकती है और स्त्री भी उस कार्य या किसी आयोजन को सफलतापूर्वक समपन्न कर सकती है फिर चाहे वह कोई धार्मिक आयोजन हो, सामाजिक कल्याण का कार्य हो अथवा कोई अन्य कार्य हो| सभी मामलों में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर न समझना वास्तव में समाज के प्रति एक प्रकार का अपराध है। आगे वे स्त्रियों की साक्षरता के इतिहास के बारे में समाज के आकलन को दोषपूर्ण मानते हैं। वे प्राचीन भारत में स्त्रियों के निरक्षर रहने को तथ्य से परे मानते हैं और प्राचीन भारत में हुईं कई विदूषी महिलाओं के नाम गिनाते हैं। वे हमें दुष्यंत-शकुंतला के प्रकरण का स्मरण कराते हैं कि किस प्रकार दुष्यंत एक ऋषि से मिले श्राप के कारण शकुंतला को विवाहोपरांत भूल जाते हैं तथा शकुंतला उन्हें भला-बुरा कह डालती हैं। लेखक इस अनर्थ में शकुंतला की शिक्षा अथवा उनके स्त्री होने से कोई संबंध नहीं है बल्कि यह तो स्वाभाविकता का परिणाम है| इसका उनके महिला होने से भी कोई संबंध नहीं है| उसी प्रकार लेखक राम-सीता प्रकरण में सीता की अग्नि परीक्षा के बारे में राम के शिक्षित होने से सीता को कोई विशेष लाभ हुआ नहीं मानते हैं। इस प्रकार लेखक स्त्रियों की शिक्षा से समाज में कोई अनर्थ होता हुआ नहीं पाते हैं। और इस प्रकार लेखक स्त्रियों के संबंध में कुतर्कवादियों की इस दलील की स्त्रियों की शिक्षा से अनर्थ होता है का खंडन सफलतापूर्वक करते हैं|



Question 3.

द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा विरोधी कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है- जैसे ‘यह सब पानी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं।’ आप ऐसे अन्य अंशों को निबंध में से छाँटकर समझिए और लिखिए।


Answer:

द्विवेदी जी ने अपनी रचनाओं में स्त्री शक्ति की महिमा को बारम्बार दोहराया है। इसी उपक्रम में वे व्यंग्य शैली का सहारा लेकर स्त्री शिक्षा के विरोध में आये कुतर्कों का बखूबी खंडन करते हैं और कहते हैं-

(क) स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट। कहने का अर्थ है लेखक के समकालीन भारत में स्त्रियों को घर में ही रहने की सलाह दी जाती थी। उन्हें परदा प्रथा का पालन करना पड़ता था। बचपन में उन्हें पिता के अधीनस्थ रहना पड़ता था युवावस्था में उन्हें पति के सहारे रहना पड़ता था और वृद्धावस्था में उन्हें पुत्र की आज्ञा का पालन करना पड़ता था। यह पुरुषवादी सोच सदियों से भारतीय समाज में स्त्रियों के उपर लागू थी। फिर ऐसे माहौल में स्त्री शिक्षा के बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात थी। सही अर्थों में इस माहौल में समाज में स्त्रियों का पढना कालकूट या विष के समान और पुरूषों का पढना अमृत के समान समझा जाता था।


(ख) अच्छा तो उत्तररामचरित में ऋषियों की वेदांतवादिनी पत्नियाँ कौन-सी भाषा बोलती थीं? उनकी संस्कृत क्या कोई गँवारी संस्कृत थी? यहां उत्तररामचरित में ऋषियों की वेदांतवादिनी पत्नियों का अर्थ वाल्मीकि और अन्य ऋषियों की पत्नियों से है। हमें ज्ञात है कि राम द्वारा सीता के परित्याग करने के उपरांत सीताजी को ऋषि वाल्मिकी के आश्रम में रहना पड़ा था। यह प्रसंग हम उत्तर रामायण में पाते हैं जहां ऋषि पत्नियों को संस्कृत भाषा में बोलना बताया गया है। इसलिए यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में स्त्रियां काफी संख्या में संस्कृत भाषा बोलती थीं।


(ग) जिन पंडितों ने गाथा-सप्तशती, सेतुबंध महाकाव्य और कुमारपालित आदि ग्रंथ प्राकृत में बनाए हैं वे यदि अपढ़ और गँवार थे तो हिंदी के प्रसिद्ध-से-प्रसिद्ध अखबार के संपादकों को भी इस जमाने में अपढ़ और गँवार कहा जा सकता है_ क्योंकि वह अपने जमाने की प्रचलित भाषा में अखबार लिखता है।


यहां पर लेखक हमें समझाते हैं कि प्राचीन भारत में प्राकृत भाषा में लिखे गये ग्रंथ के रचियता किसी मामले में अनपढ़ या गंवार नहीं थे। वे सभी विद्वान लेखक अपने समय की प्रचलित भाषा प्राकृत में लिखते थे। ऐसा इसिलिए था क्योंकि प्राकृत भाषा अधिक से अधिक लोगों में ग्राह्य थी। आज भी लेखक अपनी रचना इस जमाने की प्रचलित भाषा में लिखते हैं। इसिलिए प्राकृत भाषा में लिखने वालों को अनपढ या गंवार मानना बिल्कुल गलत है।


(घ) अत्रि की पत्नी, पत्नी-धर्म पर व्याख्यान देते समय घंटों पांडित्य प्रकट करें, गार्गी ब्रह्मवादियों को हरा दे, मंडन मिश्र की सहधर्मचारिणी शंकराचार्य के छक्के छुड़ा दे! गजब!’’


लेखक यहां अत्रि की पत्नी, गार्गी और मंडन मिश्र की पत्नी की वाक्पटुता या कहें बोलने की शैली के कायल हैं। वे इन स्त्रियों की विद्वता पर अपना खुशी मिश्रित आश्चर्य प्रकट करते हैं और मुक्त कंठ से इन स्त्रियों के सम्मान में उनकी प्रशंसा में दो शब्द कह डालते हैं। क्योंकि इन स्त्रियों की विद्वता के आगे बड़े-बड़े पुरूष विद्वान परास्त हो गये थे।



Question 4.

पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना क्या उनके अपढ़ होने का सबूत है- पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।


Answer:

पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना उनके अनपढ़ होने का सबूत बिल्कुल नहीं है। हमें यह ज्ञात है कि पुराने समय में प्राकृत भाषा आम लोगों की बोलचाल की भाषा मानी जाती थी और अधिक से अधिक लोग संवाद के लिए इसी भाषा का प्रयोग करते थे और इसी कारण इस दौर के न जाने कितने ही ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखे गये। ये सारे ग्रंथ प्राकृत भाषा में होने से लोगों के बीच आसानी से ग्राह्य थे। इन ग्रंथों के प्राकृत भाषा में लिखा होने के कारण लोग इन ग्रंथों को आसानी से समझ पाते थे| इस प्रकार प्राकृत भाषा को जनसाधारण की भाषा माना गया। यानि अधिक से अधिक लोग प्राकृत भाषा बोलते थे। यही हाल अधिकतर महिलाओं की भाषा बोलने को लेकर था। यानि अधिकतर महिलाएं प्राकृत भाषा बोलती थीं। उन स्त्रियों का प्राकृत भाषा में बोलना हमें उनके साक्षर होने की पुष्टि कराता है। हम भिन्न ग्रंथों में उन स्त्रियों के प्राकृत में बोलने पर आसानी से समझ सकते हैं कि प्राकृत इन लोगों द्वारा बोली जाने वाली एक प्रकार की राष्ट्रभाषा थी जिस प्रकार आज हिन्दी भाषा है। हम हिंदी बोलने लिखने और पढने वालों को आज साक्षर समझते हैं और उन्हें अनपढ़ समझने की भूल कदापि नहीं कर सकते। हम जिस प्रकार हिन्दी बोलने वाली महिलाओं को अनपढ़ कदापि नहीं ठहरा सकते तो उसी प्रकार प्राकृत भाषा बोलने वाली प्राचीनकालीन महिलाओं को भी हमें अनपढ़ नहीं मानना चाहिए। इस प्रकार इसका साफ सबूत मिलता है कि वे प्राकृत बोलने वाली स्त्रियां साक्षर थीं यानि वे अनपढ़ नहीं थीं।



Question 5.

परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ाते हों- तर्क सहित उत्तर दीजिए।


Answer:

यह बात बिल्कुल सत्य है। परंपरा से हमें अच्छी बातें ही सीखनी होंगी और बुरी बातों को त्यागना ही उचित है। जहां तक स्त्री-पुरूष समानता का प्रश्न है हमारा उपरोक्त कथन में कही गयी बातों को जस का तस अपने जीवन में उतारने में ही हमारी भलाई निहित है। आज के समय में जब हर ओर स्त्री पुरूषों के कंधे में कंधे मिलाकर प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं। वे पारिवारिक स्तर पर तो अपना महत्व साबित कर रही ही हैं साथ ही समाज में भी अपना नाम उंचा कर रही हैं। इस प्रकार स्त्रियां परोक्ष रूप में रास्ट्रनिर्माण में अपना योगदान दे रही हैं। वैसे भी यह यह कहावत प्रचलित है कि एक स्त्री के शिक्षित होने से उसकी आने वाली सात पीढियां तर जाती हैं यानि उनके वंशजों का उद्धार हो जाता है। यह बात पुरूषों के संदर्भ में हम कहावत में उसके एक पीढी के उद्धार होने के बारे में ही हम ऐसा पाते हैं। इस कहावत में अतिशयोक्ति हो सकती है यानि हो सकता है इसे बढ़ा चढ़ाकर कहा गया हो। पर कहावत में हम स्त्री शिक्षा की भावना की महत्ता निश्चित रूप में पाते हैं। इस आधार पर हम स्त्री-पुरूष की समानता हर हाल में अपनाने लायक और इस समानता के बारे में हमारी परंपराओं में भी जोर दिया गया है|



Question 6.

तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।


Answer:

तब और अब की शिक्षा प्रणाली में मुख्य अंतर इसके स्वरूप को लेकर है। जहां तब की यानि प्राचीन काल की शिक्षा प्रणाली गुरुकुल तक सीमित थी, वहीं वर्तमान शिक्षा प्रणाली कोचिंग इंस्टीट्यूट तक सीमित है। गुरूकुल में जहां विद्यार्थियों के लिए अनुशासन में रहना अनिवार्य था, वहीं आज की कोचिंग प्रणाली में विद्यार्थियों में अनुशासन की भावना को जगाने का काम न कर उनमें स्मार्टनेस की भावना को जगाया जा रहा है। जहां पहले की शिक्षा प्रणाली में शिक्षकों के प्रति समर्पण की मूल भावना छात्रों के अंदर विद्यमान थीं, वहीं आज इस स्वाभाविक समर्पण की भावना की गहराई को पैसे की चमक ने थोड़ा फीका कर दिया है। पेशेवराना ढंग ने आज की शिक्षा प्रणाली को ‘एक हाथ से ले और दूसरे हाथ से दे’ वाला बना दिया है। इस रवैये ने समर्पण के स्वरूप को भी बदल दिया है। एक और अन्तर जो पहले और अब की शिक्षा प्रणाली में उभर कर आया है वह है वर्तमान की शिक्षा प्रणाली में नैतिक शिक्षा का अभाव। जिस प्रकार से पहले की शिक्षा प्रणाली में सारा ध्यान छात्रों के नैतिक उत्थान पर दिया जाता था। वह बात अब शिक्षा के पेशेवर ढंग ले लेने से नहीं रही।



Question 7.

महावीरप्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, कैसे?


Answer:

महावीरप्रसाद द्विवेदी का प्रस्तुत निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है। वे अपने इस निबंध में स्त्री शिक्षा की वकालत करते हैं। वे तर्कों का सहारा लेकर अपनी बातों को हमारे सामने सही ठहराते हैं। उनके तर्क जो व्यंग्य की कसौटी पर कसे गये हैं वे सारे तर्क स्त्री शिक्षा के पक्ष में खरे उतरते हैं। उनका स्त्री शिक्षा के पक्ष में विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में निहित बातों का उदाहरण देकर पाठकों को अपनी बातों से राजी करा लेना उनकी व्यंग्य शैली की विशिष्टता ही कही जाएगी। निबंध के एक अंश में वे गार्गी जैसी विदूषी स्त्रियों की बात करते हैं। दूसरे अंश में वे मंडन मिश्र की पत्नी की बात करते हैं। एक अन्य अंश में वे कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी की बात करते हैं कि किस प्रकार रुक्मिणी कृष्ण को संस्कृत में लिखा एक लंबा सा पत्र भिजवाती हैं। वे इस प्रकार उदाहरण देकर स्त्रियों के साक्षर होने पर उनका समाज में उचित स्थान देने की वकालत करते हैं। वे इस प्रकार स्त्रियों के प्रति खुली सोच रखने की हमें शिक्षा देते हैं। इस प्रकार लेखक स्त्रीयों की प्राचीन भारत में स्थिति को अपने तर्कों से अच्छा सिद्ध करने के उपरांत उसे वर्तमान और भविष्य में हमें और अच्छा बनाने हेतु स्त्रियों के प्रति खुली सोच रखने का हमारा आह्वान करते हैं। इस प्रकार समाज में विशेषकर स्त्रियों के बारे में उनकी दूरगामी और खुली सोच उनके निबंध का अनिवार्य अंग बन पड़ी है।



Question 8.

द्विवेदी जी की भाषा-शैली पर एक अनुच्छेद लिखिए।


Answer:

द्विवेदीजी की भाषा शैली युगांतरकारी थी। कहने का अर्थ है लेखक की भाषा के कारण ही हिन्दी साहित्य का एक लंबा समय द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है। यह समय 20 वीं सदी के पूर्वाद्ध के कुछ वर्षों में निहित था। वास्तव में लेखक ने हिन्दी साहित्य को भाषा की कसौटी पर कसने का प्रयास किया। उन्होंने व्याकरण की दृष्टि से हिन्दी भाषा को शुद्ध करने का प्रयास किया। उन्होंने हिन्दी भाषा में अधिकांश अवसरों पर तत्सम शब्दों का प्रयोग किया। कहने का अर्थ है उन्होंने भाषा की शुद्धता के ख्याल से हिन्दी में कठिन शब्दों का प्रयोग किया। हालांकि उन्होंने एकाधिक अवसरों पर तद्भव शब्दों का प्रयोग भी किया। इन तद्भव यानि हिन्दी की सरल भाषा के प्रयोग के साथ उन्होंने अपभ्रंश यानि कुछ बिगड़ी बोली का भी हिन्दी भाषा में समावेश किया। कुछ स्थानों पर प्रचलित मुहावरों और कहावतों के प्रयोग से उनकी भाषा में जीवन्तता झलकती है| इसके अलावा उन्होंने अन्य भाषाओं के शब्दों का हिन्दी भाषा में समावेश और प्रयोग पर किया| इस प्रकार लेखक की रचनाओं में उनकी भाषा शैली अनूठी रही।



Question 9.

निम्नलिखित अनेकार्थी शब्दों को ऐसे वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए जिनमें उनके एकाधिक अर्थ स्पष्ट हों-

चाल, दल, पत्र, हरा, पर, फल, कुल


Answer:

चाल - मेरी चाल धीमी है।

चाल - चाल में फांसना अच्छी बात नहीं है।


दल - हाथी हमेशा दल में चलता है।


दल - तुलसी दल लाभकारी माना जाता है।


पत्र - पत्र लिखने के दिन लद गये।


पत्र - पतझड़ में पत्र पेड़ से गिरते हैं।


हरा - हमारे तिरंगे में हरा रंग देश की समृद्धि का प्रतीक है।


हरा - भारत ने आस्ट्रेलिया को खेल में हरा दिया।


पर - चिड़िया के पर मत काटो।


पर - छत पर धूप है।


पर - वहां जाओ पर जरा ध्यान से।


कुल - कार में कुल चार लोग बैठे हैं।


कुल - कुल की लाज रखना हमारा कर्तव्य है|


फल - फलों का सेवन सेहत के लिए लाभदायक है|


फल - हम कर्म करना चाहिए, फल ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए|



Question 10.

अपनी दादी, नानी और माँ से बातचीत कीजिए और (स्त्री-शिक्षा संबंधी) उस समय की स्थितियों का पता लगाइए और अपनी स्थितियों से तुलना करते हुए निबंध लिखिए। चाहें तो उसके साथ तसवीरें भी चिपकाइए।


Answer:

मैंने अपनी नानी से सुन रखा था कि उन्होंने मात्र पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की थी। जब हमें वह पढ़ते देखतीं तब उन्हें हमेशा अफसोस होता था कि वे मात्र इतना ही क्यों पढ़ पायीं। इसका कारण वे उस जमाने में स्त्री शिक्षा के प्रति परिवार और समाज के नकारात्मक रवैये को बताती थीं। वास्तव में तब जमींदारी के जमाने में मेरे नानी के घर में पैसों की कमी नहीं थी क्योंकि इस्टेट की सालाना आय 64000 रूपये थी जो तब के जमाने में काफी बड़ी राशि मानी जाती थी। नानी के आगे नहीं पढ़ पाने के वास्तविक कारणों में उस जमाने के बड़े बुजुर्गों की रूढिवादी सोच का ही नाम लिया जा सकता है। आज मेरे या मेरी एक पीढ़ी आगे के बच्चों के समय रूढिवादी सोच में काफी परिवर्तन आया है। आज आर्थिक रूप से सबल लोगों की क्या कहें कम संपन्न लोग भी अपने बच्चों विशेषकर बच्चियों को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं। निर्धन लोग अपना पेट काट कर भी यानि स्वयं भूखा रहकर भी अपने बच्चों की शिक्षा में कोई कमी नहीं रखना चाहते हैं। आज समय बिल्कुल बदल गया है। लोग शिक्षा के महत्व को समझने लगे हैं। वे समझने लगे हैं कि अच्छी शिक्षा प्राप्त कर ही हम अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए यथोचित उपाय कर सकते हैं। शिक्षित होने पर कोई हमारा शोषण नहीं कर सकता है। हमारी आंखें हमेशा खुली रहेंगी। अच्छी शिक्षा प्राप्त होने पर कोई हमारी आंख बंद होने पर भी हमारी पोटली गायब नहीं कर पायेगा। ऐसा इसिलिए होता है क्योंकि शिक्षित होने पर हमारी अक्ल की आंखें हमेशा खुली रहती हैं।



Question 11.

लड़कियों की शिक्षा के प्रति परिवार और समाज में जागरूकता आए-इसके लिए आप क्या-क्या करेंगे?


Answer:

लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में काफी विकास होने के बाद भी आज सभी परिवारों में इसकी एक जैसी स्थिति नहीं है। मैं इसके लिए पहले तो समाज में जागरूकता लाने हेतु समाज में शिक्षा के महत्व और उससे होने वाले लाभों को समाज के सामने रखूंगा। इसके बाद मैं कम मूल्य पर शिक्षा से वंचित परिवार को शिक्षित करने हेतु संसाधन प्रदान करने का हरसंभव प्रयास करूंगा। ऐसा मैं मुफ्त में उनके लिए कर पाऊं इस हेतु भी मैं प्रयासरत रहूंगा। मैं बालिकाओं की शिक्षा पर अपना ध्यान मुख्य रुप से केन्द्रित करूंगा। ऐसा मैं इसलिए करूंगा क्योंकि लड़कियों में साक्षरता का अनुपात लड़कों की अपेक्षा कम है। इनकी शिक्षा हेतु समाज को और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है| इसके लिए मैं स्वयं या अन्य द्वारा कोचिंग की व्ववस्था में लड़कियों के लिए विशेष पैकेज का भी प्रावधान रखने का प्रयास करूंगा। संभव होने पर मैं लड़कियों को मुफ्त में पढ़ाने की भी पहल करूंगा ताकि वे पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकें| मैं शिक्षा से वंचित शेष लड़कियों की शिक्षा के प्रति परिवार और समाज में जागरूकता हेतु हर संभव प्रयास जारी रखूंगा|



Question 12.

स्त्री-शिक्षा पर एक पोस्टर तैयार कीजिए।


Answer:

आज समाज में स्त्री शिक्षा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। हम इस तथ्य को पोस्टर में लिखे नारों से अच्छी प्रकार समझ सकते हैं। जैसे कि

1. नारी शक्ति है महान


हम सब मिल करें उसका सम्मान


2. नारी को जो समझे दुर्बल


उसको समझो तुम बेअक्ल


3. नारी के होने से शिक्षित


हो रहा आज स्वच्छ भारत


4. नारी आज शिक्षा के हथियार से हो सुसज्जित


बन रही है दुष्टों के लिए आफत


5. हमारा है यह पुनीत कर्तव्य


बच्चियों को समझें बच्चों के लगभग


6. बच्चियों को बचायें हम सब


बाकि का काम कर लेंगी बच्चियां सब


7. ईश्वर की नजर में जब हैं सब बराबर


तो बच्चे-बच्चियों में हम क्यों करें अन्तर


8. बच्चा है भाग्य से


तो बच्ची है सौभाग्य से



Question 13.

स्त्री-शिक्षा पर एक नुक्कड़ नाटक तैयार कर उसे प्रस्तुत कीजिए।


Answer:

डम-डम-डम-डम

कॉलेज के विद्यार्थियों के समूह का दृश्य है। इस समूह में दो छात्र एवम दो छात्राएं हैं।


पहला छात्र- सुनो भाई ध्यान से सुनो। कल पास के गांव में एक युवती की हत्या कर दी गई।


दूसरा छात्र- क्या युवती पढ़ी-लिखी थी?


पहला छात्र- नहीं जी! वह तो साफ मूर्ख थी।


दूसरा छात्र- उसकी हत्या क्यों हुई?


पहला छात्र- ग्रामीणों ने उसे डायन समझकर मार डाला।


दूसरा छात्र- तभी तो ऐसा हुआ।


पहला छात्र- मैं नहीं समझा।


पहली छात्रा- इसमें समझने वाली कौन सी बात है?


दूसरी छात्रा- वही तो।


पहला छात्र- कैसे-कैसे?


दूसरा छात्र- युवती का पढ़ा-लिखा होने से उसका विवाह गांव में थोड़े ही होता!


पहली छात्रा- नहीं यह बात नहीं है।


दोनों छात्र (एक स्वर में) - फिर क्या बात है?


पहली छात्रा- पढा-लिखा होने पर छात्रा अपने अधिकारों के लिए लड़ सकती थी।


दूसरी छात्रा- और वह समाज में लोगों को कुरीतियों के विरुद्ध जागरूक कर सकती थी।


दोनों छात्र (एक स्वर में) -और फिर उस युवती की हत्या नहीं होती।


दोनों छात्राएं(एक स्वर में) -हां हां।


डम-डम-डम-डम


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